

नोएडा:ग्रेटर नोएडा में हाल ही में निक्की भाटी की दहेज हत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह मामला सिर्फ एक महिला की मौत तक सीमित नहीं, बल्कि भारत में महिलाओं के खिलाफ जारी उस सामाजिक अपराध को उजागर करता है जिसे दहेज हत्या कहते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2022 में देशभर में 6,516 दहेज हत्या के मामले दर्ज हुए। यानी औसतन हर दिन 18 महिलाएं दहेज की भेंट चढ़ रही हैं। तुलना की जाए तो बलात्कार के बाद हत्या के मामलों से यह संख्या 25 गुना अधिक है।
निक्की भाटी केस में जांच जारी है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि भारत में दहेज हत्या के मामलों में पीड़ित परिवार को जल्दी न्याय मिलना बेहद कठिन है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐसे मामलों में पहले साल में न्याय मिलने की संभावना महज़ 2% है। लंबी कानूनी प्रक्रिया, गवाहों पर दबाव और सामाजिक–परिवारिक समझौते इस अपराध को और गहरा बना देते हैं।
समाजशास्त्रियों का कहना है कि दहेज प्रथा आज भी भारतीय समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है। आधुनिकता और शिक्षा बढ़ने के बावजूद यह बुराई खत्म नहीं हुई। महिलाओं को समान दर्जा देने की बातें तो होती हैं, लेकिन विवाह के समय दहेज की मांग और उसका दबाव आज भी आम है।
कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि कड़े कानून होने के बावजूद इनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। दहेज हत्या के दोषियों को सख्त और समयबद्ध सज़ा मिले तभी इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है। साथ ही, समाज को भी इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि शादी एक आर्थिक लेन–देन का सौदा है।
निक्की भाटी केस ने फिर एक बार यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक महिलाएं दहेज की बलि चढ़ती रहेंगी और कब इस अपराध के खिलाफ वास्तविक सामाजिक बदलाव आएगा।



